यह एक क़व्वाली गीत हैं जो आज भी संगीत प्रेमियों के दिलो में अपनी अलग पहचान रखता हैं। इस गीत में आपको शास्त्रीय संगीत, सूफी क़व्वाली और पारंपरिक कव्वाली संगीत का एक आदर्श मिश्रण देखने को मिलता हैं जो इसे और भी खास बनाता हैं। गाने का एक मुख्य आकर्षण नुसरत फतेह अली खान का Vocal Performance है। उनकी आवाज गहरी और समृद्ध है, और वे गीत के भावों को पूरी तरह से व्यक्त करने का काम करते हैं।
Tumhe Dillagi bhool Jani padegi movie name यह किसी फिल्म के Soundtrack का गीत नहीं बल्कि इसे Single Record किया गया था लेकिन साल 2011 में इसे 30 Greatest Hits Rahat and Nusrat Fateh Ali Khan नाम से एल्बम में पेश किया गया। यह एल्बम में नुसरत फ़तेह अली खान द्वारा गाये गए 30 सर्वश्रेष्ठ क़व्वाली गीत और ग़ज़ल का संगम देखने को मिलता हैं। तुम्हे दिल्लगी भूल जानी पड़ेगी गाने की रिलीज़ डेट की बात करें तो यह 90's में गाया गया था। लेकिन सटीक रिलीज़ जानकारी उपलब्ध नहीं हैं। क्योंकि नुसरत साहब ज्यादातर प्रोग्राम में ही या शो में अपने गाने गाते थे।
आ... आ...
तुम्हें दिल्लगी भूल जानी पड़ेगी
(तुम्हें दिल्लगी भूल जानी पड़ेगी
मुहब्बत की राहों में आ कर तो देखो) ×2
मुहब्बत की राहों में आ कर तो देखो
(तुम्हें दिल्लगी भूल जानी पड़ेगी
मुहब्बत की राहों में आ कर तो देखो) ×2
आ...
(तुम्हें दिल्लगी भूल जानी पड़ेगी
मुहब्बत की राहों में आ कर तो देखो) × 2
तड़पने पे मेरे न फिर तुम हंसोगे
(तड़पने पे मेरे न फिर तुम हंसोगे) ×2
कभी दिल किसी से लगा कर तो देखो
होंठों के पास आई हंसी, क्या मजाल है
दिल का मामला है कोई दिल्लगी नहीं
ज़ख्म पे ज़ख्म खा के जी
अपने लहू के घूंट पी
आह न कर लबों को सी
इश्क है दिल्लगी नहीं
दिल लगा कर पता चलेगा तुम्हे
आशिकी दिल्लगी नहीं होती
कुछ खेल नहीं है इश्क की लाग
पानी न समझ ये आग है आग
खून रुलाएगी ये लगी दिल की
खेल समझो न दिल्लगी दिल की
ये इश्क नहीं आसां
बस इतना समझ लीजिये
एक आग का दरिया है
और डूब के जाना है
तुम्हें दिल्लगी भूल जानी पड़ेगी
मुहब्बत की राहों में आ कर तो देखो
तड़पने पे मेरे न फिर तुम हंसोगे
तड़पने पे मेरे न फिर तुम हंसोगे
कभी दिल किसी से लगा कर तो देखो
(वफ़ाओं की हम से तवाफ़ तो नहीं है)
वफ़ाओं की हम से तवाफ़ नहीं है...
जमाने को अपना बना कर तो देखा
हमें भी तुम अपना बना कर तो देखो
खुदा के लिया छोड़ दो अब ये परदा...
रुख से नक़ाब उठा, के बड़ी देर हो गई
माहौल को तिलावत-ए-कुरान किए हुए
खुदा के लिए छोड़ दो अब ये परदा...
हम ना समझे तेरी नज़रों का तक़ाज़ा क्या है
कभी पर्दा कभी जलवा ये तमाशा क्या है
खुदा के लिए छोड़ दो अब ये परदा...
जान-ए-जां हम से उल्झन नहीं देखी जाती
खुदा के लिए छोड़ दो अब ये परदा...
खुदा के लिया छोड़ दो अब ये पर्दा
कह
के है आज हम तुम नहीं ग़ैर कोई
शब-ए-वस्ल भी है हिजाब इस क़दर क्यों
जरा रुख से आंचल उठा कर तो देखो
जफाएं बहुत की बहुत ज़ुल्म ढाये
कभी इक़ निगाह-ए-करम इस तरफ भी
(कभी इक़ निगाह-ए-करम इस तरफ भी)
हमेंशा हुए देख कर मुझ को बरहम
किसी दिन जरा मुस्कुरा कर तो देखो
जो उल्फ़त में हर इक़ सितम है गवारा
ये सब कुछ है पास-ए-वफा तुम से वरना
सताते हो दिन रात जिस तरह मुझ को
(सताते हो दिन रात जिस तरह मुझ को)
किसी ग़ैर को यूँ सता कर तो देखो
अगरचे किसी बात पर वो खफा हैं
तो अच्छा यही है तुम अपनी सी कर लो
वो माने न माने ये मर्ज़ी है उनकी
(वो माने न माने ये मर्ज़ी है उनकी)
मगर उन को पुरनम मना कर तो देखो
तुम्हें दिल्लगी भूल जानी पड़ेगी
मुहब्बत की राहों में आ कर तो देखो...
यह एक बेहतरीन ग़ज़ल गीत हैं। इस गीत की सबसे खास बात ये हैं कि इसमे किसी आधुनिक संगीत उपकरण का न उपयोग होकर संगीतकार नुसरत फ़तेह अली खान जी द्वारा गाया गया राग और हारमोनियम, ढोल से बनाया गया गीत हैं।
यह गीत एक बेहद ही खूबसूरत उर्दू ग़ज़ल है जिसे एक गीत के रूप में प्रस्तुत किया गया। इस ग़ज़ल के लेखक पुरनम इलाहाबादी जी ने बहुत ही बेहतरीन प्यार में आने वाली चुनौतियों भरे अल्फ़ाज़ों को एक ग़ज़ल के रूप में पेश किया हैं।